लेख- सैनिकों के अधिकार: एक राष्ट्र की नैतिक जिम्मेदारी

Srishti Sharma article

सैनिकों के अधिकार: एक राष्ट्र की नैतिक जिम्मेदारी


सृष्टि शर्मा, पीएच० डी० रिसर्च स्कॉलर,

एच० एन० बी० गढ़वाल विश्वविद्यालय (उत्तराखंड)

विश्व भर में बढ़ते युद्धों, संघर्षों और वैश्विक अव्यवस्था (Global Disorder) के इस दौर में मानवाधिकारों की मूल अवधारणा—हर व्यक्ति का स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और समानता के साथ जीवन जीने का मूल्य अधिकार—कई गंभीर चुनौतियों से घिरती जा रही है। आज हम नागरिक अधिकारों की रक्षा और संवर्धन पर चर्चा करते हैं, लेकिन अक्सर यह भूल जाते हैं कि जो लोग स्वयं हमारे अधिकारों की रक्षा में लगे हैं—हमारे सैनिक—वे भी उतने ही मानवाधिकारों के अधिकारी हैं जितने कि आम नागरिक।

दार्शनिक जॉन लॉक (John Locke) ने प्राकृतिक अधिकारों—जीवन, स्वतंत्रता और संपत्ति (Life, Liberty and Property)—को जन्मसिद्ध अधिकार बताया। ह्यूगो ग्रोटियस (Hugo Grotius), जिन्हें अंतर्राष्ट्रीय कानून का जनक कहा जाता है, ने आत्म-संरक्षण (Self-Preservation) को सार्वभौमिक कानून का पहला सिद्धांत माना। उनके ये विचार स्पष्ट करते हैं कि अधिकार किसी राज्य द्वारा नहीं दिए जाते, बल्कि मनुष्य होने के नाते प्राप्त होते हैं। संयुक्त राष्ट्र ने भी 1948 में विश्व मानवाधिकार दिवस की घोषणा इसी उद्देश्य से की कि हर इंसान को उसके अधिकारों के प्रति जागरूक किया जाए।

लेकिन यहाँ एक महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा होता है—क्या हमारे सैनिक, जो इस राष्ट्र की सुरक्षा की रीढ़ हैं, इन अधिकारों की परिधि में सचमुच शामिल महसूस होते हैं?

सैनिक समाज के किसी भी अन्य व्यक्ति की तरह मानवाधिकारों के अधिकारी हैं, लेकिन सैन्य सेवा की प्रकृति ऐसी है कि उनके अधिकार एक विशिष्ट ढंग से प्रभावित, सीमित या कई बार पूर्णतः जोखिमग्रस्त हो जाते हैं। सैन्य संस्था आज भी एक ऐसा ढांचा है जहाँ सैनिक पूरे राष्ट्र के अधिकारों की रक्षा करते हैं, लेकिन कई बार उनके अपने अधिकारों पर प्रश्न उठते हैं।

कश्मीर जैसे संवेदनशील और उग्रवादी क्षेत्रों में यह धारणा लंबे समय तक बनी रही कि मानवाधिकार आतंकवादियों या नागरिकों के लिए हैं, न कि सैनिकों के लिए। सुरक्षा बलों पर कुछ अकादमिक विद्वानों जैसे सीमा गाज़ी द्वारा आरोप लगाए गए कि उन्होंने कश्मीर में नागरिकों के ऊपर अत्याचार किए। हालाँकि, इन बहसों में अक्सर वह पक्ष अनदेखा रह जाता है जहाँ सैनिक स्वयं सबसे अधिक मानवाधिकार हनन का शिकार होते हैं।

कश्मीर, आतंकवाद और सैनिकों का मानवाधिकार उल्लंघन

कश्मीर घाटी और उत्तरी सीमाएँ दशकों से आतंकवाद का केंद्र रही हैं। यहाँ सैनिक जिस परिस्थिति में कार्य करते हैं, वह स्वयं में मानवाधिकारों के खिलाफ गंभीर चुनौतियाँ जन्म देती है—

  • – लगातार होने वाली क्रॉस-बॉर्डर फायरिंग,
  • – सीज़फायर उल्लंघन,
  • – पेट्रोलिंग के दौरान निशाना बनाना,
  • – घात लगाकर हमले (Ambush),
  • – पत्थरबाज़ी, उग्र भीड़ और मनोवैज्ञानिक दबाव।

ये सभी परिस्थितियाँ सैनिकों के जीवन और सुरक्षा के अधिकार का व्यवस्थित रूप से उल्लंघन करती हैं।

इसी संदर्भ में आतंकवादी हमले सबसे क्रूर रूप में सामने आते हैं। पुलवामा और उरी हमले केवल सैन्य ठिकानों पर हमले नहीं थे, बल्कि वे मानवाधिकारों पर सीधा प्रहार थे। इन घटनाओं में व्यापक रूप से सैनिकों की जान गई—जो कि उनके Life और Security के अधिकार का खुला हनन था।

पहलगाम जैसे हालिया हमले इस दोहरी त्रासदी को और स्पष्ट करते हैं। एक ओर आतंकवादी आम नागरिकों को निशाना बनाते हैं, और दूसरी ओर इन हमलों के बाद होने वाली मुठभेड़ों में सैनिकों को अत्यधिक जोखिम उठाना पड़ता है। नागरिकों की हत्या और सैनिकों की शहादत—दोनों मिलकर मानवता के मूल सिद्धांतों को झकझोर देते हैं।

आतंकवादी हमले इस बात का जीवंत प्रमाण हैं कि सैनिकों पर मानवाधिकारों का सबसे अधिक और सबसे निर्दयता से उल्लंघन आतंकवाद के माध्यम से होता है। राष्ट्र के प्रहरी होने के बावजूद वे बार-बार उन स्थितियों का सामना करते हैं जो किसी भी इंसान के मूल अधिकारों के विरुद्ध हैं।

मानवाधिकार के विमर्श में सैनिकों को केंद्र में लाने की आवश्यकता

हमारी मानवाधिकार बहस अक्सर नागरिकों, महिलाओं, बच्चों, अल्पसंख्यकों या प्रवासियों तक सीमित रह जाती है। इन विमर्शों में सैनिकों का अधिकार, उनकी सुरक्षा, मानसिक स्वास्थ्य, पारिवारिक दायित्व और सेवा-शर्तों के दौरान उनके मानवीय अधिकारों की चर्चा बहुत न्यूनतम स्थान प्राप्त करती है।

यह भूलना अनुचित होगा कि सैनिक कोई मशीन नहीं—एक जीवित इंसान है, जिसके भीतर भावनाएँ, परिवार और भविष्य की आकांक्षाएँ होती हैं। वह राष्ट्र की सीमाओं पर खड़े होकर हमारी स्वतंत्रता की रक्षा करता है, लेकिन स्वयं प्रतिदिन अपनी स्वतंत्रता, सुरक्षा और गरिमा के जोखिम का सामना करता है।

इसलिए अब समय आ चुका है कि मानवाधिकार का विमर्श व्यापक हो और उसमें सैनिकों के अधिकारों को केंद्रीय स्थान दिया जाए। यह न केवल कानूनी, बल्कि नैतिक और मानवीय दायित्व भी है।

निष्कर्ष

विश्व के बदलते परिदृश्यों और बढ़ती हिंसा के बीच मानवाधिकारों की वास्तविक भावना को पुनः जागृत करने की आवश्यकता है। जब तक हम अपने सैनिकों को इस ढांचे का केंद्र नहीं बनाएँगे, तब तक मानवाधिकार का उद्देश्य अधूरा रहेगा।

सृष्टि शर्मा, पीएच० डी० रिसर्च स्कॉलर,
एच० एन० बी० गढ़वाल विश्वविद्यालय (उत्तराखंड)

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